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रानी दुर्गावती शोध संस्थान

गढ़ मंडला की महारानी दुर्गावती न केवल एक योद्धा थीं , अपितु पर्यावरण की संरक्षिका जनता के हितों की रक्षा करने वाली एक कुशल प्रशासक थीं। उन्होंने अपनी समय में कई नवाचार किया। सामाजिक समरसता को व्यक्तिगत जीवन में अपनाते हुए राजा दलपत शाह का वरण किया। स्त्रियों की शिक्षा, तालाब का निर्माण, मंदिर, महलों एवं गढ़ों का निर्माण, मुगल शासको से लोहा लेने हेतु समुचित व्यूह रचना का निर्माण इत्यादि।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 कालिंजर फोर्ट में हुआ और अंतिम सांसे उन्होंने 24 जून 1564 को नरई नाला जबलपुर में ली। उन्होंने अपने शासनकाल में समाज व देश को जो संदेश दिया वह आज भी अमर है। उनका यह संदेश की जो नारी घर की शोभा बन सकती है वह रणचंडी बनकर शत्रुओं पर प्रहार भी कर सकती है और कुशल प्रशासक बनकर जनता की सेवा भी कर सकती है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि उनके समय में था।
रानी दुर्गावती ने मुगलों द्वारा होने वाले अत्याचारों, नारी अपमान बलात धर्म परिवर्तन से भारतवर्ष को बचाया। उनके राज्य में 52 गढ़ और 52 तालाब थे। राज्य बहुत ही उन्नत और समृद्ध था। प्रजा का लगान स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों के रूप में हुआ करता था।
दुर्भाग्य की बात है कि रानी दुर्गावती को जो इतिहासकारों द्वारा सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला और ना ही साहित्यकारों ने उन्हें यथायोग्य सम्मान दिया। रानी दुर्गावती की शौर्य गाथा मात्र जबलपुर और उसके आसपास के क्षेत्र में सिमट कर रह गई। यह न केवल रानी दुर्गावती के साथ में अन्याय है अपितु प्राणोत्सर्ग करने वाली संपूर्ण प्रेरणा के साथ अन्याय है। मुगल और ब्रिटिश इतिहासकार एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारतीय इतिहासकारों ने भी रानी दुर्गावती के प्रति वह सम्मान नहीं दिखाया यह बात समझ में नहीं आती। इसी तरह जिस प्रकार पृथ्वीराज चौहान का वर्णन चंद्रवरदाई ने किया, महाराणा प्रताप का श्याम नारायण पांडे ने, शिवाजी और छत्रसाल के बारे में भूषण ने, रानी लक्ष्मीबाई का सुभद्रा कुमारी चौहान ने किया, उसी प्रकार रानी दुर्गावती का वर्णन करने वाला कोई साहित्यकार भी सामने नहीं आया। महाकौशल, बुंदेलखंड मध्य प्रदेश अपितु पूरे राष्ट्र की प्रेरणा पुंज हैं। उनका सम्मान राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं अभी तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए।
इसी उद्देश्य को लेकर रानी दुर्गावती शोध संस्थान की स्थापना की गई है जो रानी दुर्गावती से जुड़े हुए प्रसंगों, स्थलों स्थापत्य कलाओं, कहानियां एवं किवदंतियों, प्रशासनिक दक्षताओं, सामाजिक समरसता संबंधित जीवन मूल्यों, स्त्री शिक्षा एवं सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, मनोवैज्ञानिक प्रबलताओं कूटनीतिक निर्णयों, सर्वसमावेशी व्यवस्थाओं इत्यादि को आधुनिक संदर्भों में प्रासंगिक बनाकर उन पर कार्य करने के लिए तत्पर है। भारतवर्ष की संस्कृति पर जिस प्रकार के प्रहार रानी दुर्गावती के समय में हो रहे थे, हो सकता है आज उनके दिशा एवं प्रकार में अंतर हो सकता है। कुछ अंतर आया हो पर प्रहार अभी भी हो रहे हैं। ये प्रकार धार्मिक कट्टरता, स्त्री पुरुष संघर्ष, पाश्चात्य संस्कृति, आडंबर प्रदर्शनकारी समाज, विदेशी भाषा, बाजार वाद एवं भौतिकता के है। इनका सामना करने के लिए भी हमें रानी दुर्गावती जैसे व्यक्तित्व के जीवन से प्रेरणा लेनी होगी।

न्यास के उद्देश्य

  • 4.1. रानी दुर्गावती से संबंधित प्रकाशित एवं अप्रकाशित साहित्य का संग्रहण।
  • 4.2. रानी दुर्गावती से संबंधित रचनाकारों की काव्य गोष्ठी एवं सम्मेलन आयोजित करना।
  • 4.3. रानी दुर्गावती से संबंधित विलुप्तप्राय पांडुलिपियों/रचनाओं का प्रकाशन कर संरक्षित करना।
  • 4.4. रानी दुर्गावती से संबंधित विभिन्न विषयों पर अनुसंधान एवं ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करते हुए शोध परक जानकारी एकत्रित करना।
  • 4.5. शैक्षणिक संस्थानों में रानी दुर्गावती से संबंधित साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन करना।
  • 4.6 समाज के दूरस्थ ग्रामीणों एवं वनांचलों के निवासी, आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों एवं क्षेत्र के सर्वांगीण विकास हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य तथा लोक संस्कार हेतु विधिक सेवा प्रकल्पों की योजना बनाकर उनका संचालन करना उन क्षेत्रों में इसी उद्देश्य से कार्यरत संस्थाओं को आवश्यक मार्गदर्शन, आर्थिक सहायता एवं सहयोग प्रदान करना।
  • 4.7 पद 4.6 में उल्लेखित वर्गों की शिक्षा युगानुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से प्राथमिक से लेकर उच्चतर, माध्यमिक, विश्वविद्यालय शिक्षा को प्रदान करने हेतु कार्यक्रमों, संस्थाओं योजनाओं का संचालन करना।
  • 4.8. उल्लिखित वर्गों के स्वास्थ्य संवर्धन हेतु प्रचलित पारंपरिक पद्धतियों का विकास एवं संरक्षण कर उनके माध्यम से आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों की समस्त सुविधाओ को जुटाकर उचित प्रयास करना।
  • 4.9. इन वर्गों के आर्थिक विकास हेतु पारंपरिक कौशल प्रदान कर उसका विकास करना। वनौषधि संग्रहण, पशुपालन, कृषि वन निधि संवर्धन, परंपरागत कुटीर उद्योग एवं अन्य सभी रोजगार से जुड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षण, मार्गदर्शन एवं आवश्यक सहयोग प्रदान करना। आधुनिक प्रणालियों के माध्यम से आर्थिक विकास हेतु प्रयास करना। गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का विकास करना। अधोसंरचनात्मक विकास हेतु योजनाओं का संचालन एवं क्रियान्वयन करना।
  • 4.10. ऐतिहासिक बोध, सांस्कृतिक चेतना संवर्धन (कला समस्त विधाओं सहित सामाजिक संरचना संरक्षण आदि कार्यक्रमों का संचालन एवं क्रिया नियमन करना।)
  • 4.11. पारंपरिक खेलों का संरक्षण एवं अन्य आधुनिक खेलों के प्रति रुचि एवं सुविधाओं प्रशिक्षण आदि का प्रबंधन करना एवं युवा कल्याण हेतु युवा मंडलों की रचना, व्यावसायिक प्रशिक्षण, संस्कार, योग शिक्षा आदि विधाओं पर कार्य करना।
  • 4.12. मातृशक्ति के उत्थान हेतु विस्तार कार्यक्रम का संचालन, पोषाहर एवं विकास के क्षेत्र में कार्यक्रम संचालित करना।
  • 4.13. संबंधित क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के योगक्षेम की व्यवस्था करना एवं तकनीकी व आर्थिक सहयोग प्रदान करना।
  • 4.14. उल्लिखित क्षेत्रों में दृश्य श्रव्य एवं प्रशासन माध्यमों से संबंधित विषयों का प्रचार-प्रसार कर जनचेतना जागृत करना, संबंधित क्षेत्रों में अनुसंधान विकास हेतु पत्र पत्रिकाओं एवं शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन करना।
  • 4.15. संबंधित क्षेत्रों में कार्यक्रम संचालन हेतु उचित प्रशिक्षण एवं उचित मार्गदर्शन की व्यवस्था करना।
  • 4.16. संस्था के सुचारू संचालन हेतु बिना लाभ हानि के आधार पर कार्यक्रम चलाना चल एवं अचल संपत्तियों को क्रय विक्रय कर दान अनुदान के स्वरूप में प्रदान करना।
  • 4.17. न्यास के उद्देश्य की पूर्ति हेतु समस्त कार्य करना।
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